February 7, 2023

उत्तराखंड में होने जा रही है देश में सबसे सुरंगे, विकास के नाम पर मिल रहा है विनाश

उत्तराखंड में विकास के नाम पर चल रहे प्रोजेक्ट लोगों को अपनी बर्बादी की ओर ले जा रहे हैं, हाल ही में जोशीमठ की मौजूदा स्थिति को देखकर समझा जा सकता है।

विकास के नाम पर उत्तराखंड को मिल रहा है विनाश

बारहमासी सड़क हो, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग परियोजना हो या जलविद्युत परियोजना, पहाड़ों को चीर कर सुरंगें बनाई जा रही हैं, जो हर किसी की टेंशन बढ़ा रही हैं. अगले 10 साल में उत्तराखंड देश में सबसे ज्यादा रेल रोड टनल वाला राज्य होगा। अभी यहां 18 टनल हैं, आगे 66 टनल बनाई जानी हैं।

कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए भूकंप और लैंड स्लाइड के जोखिम वाले पहाड़ों पर भी बढ़ोतरी होगी। जोशीमठ की हालत पर सबकी नजर है, अगर यहां जलविद्युत सहित अन्य परियोजनाओं के लिए पहाड़ों का इस्तेमाल होता रहा तो स्थिति बहुत खतरनाक हो जाएगी।

प्रदेश में ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल मार्ग पर भी काम जोरों पर है। कहने को तो रेल मार्ग लोगों की सुविधा के लिए बनाया जा रहा है, लेकिन आने वाले समय में यह सुविधा के बजाय तनाव का कारण भी बन सकता है।

पहाड़ों के अंदर बन रही सुरंगों और दुर्गम पहाड़ों पर बहुमंजिला घरों और होटलों का दबाव इतना बढ़ गया है कि हिमालय के पहाड़ भी इसे सहन नहीं कर पा रहे हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि अगले पांच साल में उत्तराखंड देश का पहला ऐसा पहाड़ी राज्य होगा जहां सबसे ज्यादा सुरंगें होंगी।

उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति को बेहतर जानने वाले वैज्ञानिकों के लिए यह सुरंग तनाव बन रही है। इस स्थिति को लेकर वैज्ञानिक भी चिंतित हैं। बताया जा रहा है कि जिस तरह से इन पहाड़ों को खोदकर बनाया जा रहा है, यह भविष्य के लिए ठीक नहीं है।

उत्तराखंड में ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल मार्ग पर ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक करीब 12 स्टेशन बन रहे हैं। इसके लिए 17 टनल बनाई जाएंगी। 126 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली ट्रेन 70 फीसदी पहाड़ों से गुजरते हुए अपने गंतव्य तक पहुंचेगी।

ऐसे में पहाड़ों के अंदरूनी हिस्से में तेजी से काम चल रहा है। सरकारें जरूर वैज्ञानिक पहलू को ध्यान में रखकर काम कराने की बात कर रही हैं। जाने-माने पर्यावरणविद और टिहरी बांध आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा के पुत्र राजीव नयन बहुगुणा भी इन परियोजनाओं को बेहद खतरनाक बता रहे हैं।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में सड़क और रेल मार्ग के अभाव में जिस तरह का काम हो रहा है, वह एक अदृश्य खतरा है. पहाड़ों में अंधाधुंध ब्लास्टिंग की जगह दूसरे उपाय भी अपनाए जा सकते हैं।

उन्होंने माधो सिंह भंडारी द्वारा 600 वर्ष पूर्व मलेथा में बनाई गई सुरंग का उदाहरण दिया, आज तक कोई समस्या नहीं है, क्योंकि इसके लिए कोई विस्फोट नहीं किया गया था, पूरी सुरंग हाथ से बनाई गई थी. भूवैज्ञानिक बीडी जोशी भी ऐसा ही मानते हैं।

उनका कहना है कि पहाड़ों में चल रहे प्रोजेक्ट्स भले ही बहुत महत्वपूर्ण हों, लेकिन एक बात का ध्यान रखना होगा कि अगर इतना कुछ होने के बाद भी कुछ नहीं बचेगा तो क्या होगा।

Vaibhav Patwal

Haldwani news

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