Breaking News
Home / उत्तराखंड न्यूज़ / उत्तराखंड की मिट्टी में है देशभक्ति, यहां बकरियां भी बन जाती हैं सेना में सेनापति

उत्तराखंड की मिट्टी में है देशभक्ति, यहां बकरियां भी बन जाती हैं सेना में सेनापति

उत्तराखंड का इतिहास युद्ध वीरों की वीर गाथाओं से भरा पड़ा है, यहां के कई लोग दुनिया भर में मशहूर हैं। दुनिया भर के देशों ने भारतीय सेना की वीरता और पराक्रम को पहचाना है, लेकिन आज हम आपको एक ऐसे युद्ध नायक के बारे में बताने जा रहे हैं जो अपने आप में अनूठा था। हम बात कर रहे हैं एक भूत की जिसका नाम बैजू बकरा है। कहने को बैजू बकरा था, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उसके कृत्यों ने गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों की जान बचाई। इस तरह इस बकरे को युद्ध के बाद युद्ध वीरों का सम्मान दिया गया। इतना ही नहीं उन्हें सेना में जनरल का पद भी दिया गया था।

 

आम बकरी से बैजू बकरी के सामान्य होने की कहानी वाकई में अद्भुत है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अफगानिस्तान में विद्रोह चरम पर था। इस दौरान ब्रिटिश सेना के 1700 जवान शहीद हुए थे। बाद में गढ़वाल राइफल्स की एक टुकड़ी को मोर्चे पर अफगानिस्तान भेजा गया, लेकिन यह टुकड़ी अफगानिस्तान के चित्राल के पास रास्ता भटक गई। गढ़वाल राइफल्स के सैकड़ों जवान कई दिनों तक भूख से लड़ते रहे। एक दिन सैनिकों ने देखा कि सामने की झाड़ियों में कुछ हलचल हो रही है। सैनिकों ने तुरंत अपनी बंदूकें उस दिशा में खींच लीं।

जवानों के गोली चलाने से पहले ही झाड़ी से एक मजबूत बकरा निकला। बकरी की लंबी दाढ़ी थी। बकरी सिपाहियों की ओर देखने लगी, इधर भूखे सिपाहियों के मन में बकरी खाने का ख्याल आया। वे पकड़ने के लिए उसकी ओर चलने लगे। फिर बकरी ने तेजी से अपने कदम पीछे खींच लिए और दौड़ने लगी। सिपाही भी उसके पीछे भागने लगे। बाद में बकरी एक खुले मैदान में रुक गई। आरक्षक जब वहां पहुंचा तो देखा कि बकरी जमीन खोद रही है। सिपाहियों ने जब पास जाकर देखा तो खेत में आलू निकले हुए थे।

इसके बाद सिपाहियों ने पूरा खेत खोदना शुरू कर दिया। जहां से अगले कई दिनों तक आलू एकत्र किया गया। इस तरह गढ़वाल राइफल्स के जवानों की जान युद्ध के बीच में ही बच गई। सिपाहियों ने भी बकरी पर उपकार किया और उसे अपने साथ लैंसडाउन वापस ले आए। यहां उनकी वंशावली बनाई गई और उनके लिए अलग कमरे की भी व्यवस्था की गई।

बताया जा रहा है कि बैजू बकरी को पूरे लैंसडाउन में कहीं भी घूमने का अधिकार था। उसे बाजार में किसी भी दुकान से कुछ भी खाने की इजाजत थी। बैजू बकरी जो भी खाती थी, सेना उसका बिल देती थी। इस प्रकार कहानी का उल्लेख डॉ. रणवीर सिंह द्वारा लिखित पुस्तक ‘लैंसडाउन: सभ्यता और संस्कृति’ में किया गया था। यह कहानी आज भी गढ़वाल क्षेत्र की लोककथाओं में कही जाती है।

About Vaibhav Patwal

Haldwani news