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इतिहासकारो के हाथ लगा सबसे कीमती खज़ाना, सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े हो सकते है उत्तराखंड के तार

भारत एक विशाल देश है और हर कोने में सभ्यता के निशान पाए जाते हैं। यहां तक ​​कि सबसे प्राचीन सभ्यता भी यहीं पाई जाती है। हाल ही में उत्तराखंड में हर जगह बिखरे हुए समृद्ध इतिहास के साक्ष्य मिलते हैं। यह देश के लिए सबसे बड़ी खबर है। हाल ही में यहां यमुना घाटी में इतिहास का ऐसा खजाना मिला है, जिससे पता चलता है कि उत्तराखंड का संबंध कभी सिंधु घाटी सभ्यता से रहा है।

उत्तराखंड की यमुना घाटी में उत्तरकाशी जिले के बरनीगढ़ क्षेत्र में पत्थर से बनी महिषमुखी चतुर्भुज मानव प्रतिमा मिली है। यह खोज रोम से प्रकाशित प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ईस्ट एंड वेस्ट के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुई है। प्राचीन प्रतिमा की खोज का श्रेय दून पुस्तकालय एवं अनुसंधान केंद्र को जाता है। जिसकी पहल पर पुरातत्व इतिहास के शोधकर्ताओं ने उत्तरकाशी के देवल गांव में महिषामुखी चतुर्भुज मानव प्रतिमा की खोज की। शोधकर्ताओं का कहना है कि सिंधु घाटी सभ्यता की यह मूर्ति।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता और उत्तराखंड के आपसी संबंध को दर्शाती है। इस मूर्ति को ‘आदि शिव’ की मूर्ति से जोड़ा जा रहा है जो सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त हुई है। दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर के शोधकर्ता और इतिहासकार प्रोफेसर महेश्वर प्रसाद जोशी का कहना है कि यमुना घाटी में सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े अवशेष पूर्व में मिले हैं।

उत्तरकाशी और देहरादून की सीमा का एक समृद्ध इतिहास है। इससे पहले भी कालसी में सम्राट अशोक के शिलालेख, जगतग्राम में ईंटों से बने अश्वमेध यज्ञ की वेदियां मिली हैं और इस क्षेत्र में पुरोला भी पाए गए हैं। लाखमंडल में देवालय समूह प्रसिद्ध है। किसी विशेष क्षेत्र की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत को गहराई से समझने के लिए पुरातात्विक साक्ष्य, भाषा विज्ञान और आनुवंशिकी का गहन अध्ययन आवश्यक है। दून पुस्तकालय एवं अनुसंधान केंद्र के प्रयासों से उत्तराखंड हिमालय के इतिहास, पुरातत्व, समाज एवं संस्कृति से जुड़े अन्य पहलुओं को उजागर करने का प्रयास किया जा रहा है।

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